सावन: एक सत्यकथा - भाग १
सावन: एक सत्यकथा
न युग बीते न शताब्दियां बीतीं परंतु दुर्मुख काल का प्रभाव ! उस चमत्कार के साक्षी रहे निर्दोष ग्रामीण ही उस कथा को भूल बैठे। जिन बिरवों की जड़ें गांव में थीं पर ठूंसे और कल्ले महानगरों में और फुनगियां मेट्रो सिटीस् में उनसे तो क्या ही आशा।
एल के जी का तब चलन नहीं था और हमारे जैसे मेधावी 'द जीनियस' एक दू तीन में काहे पढ़ते तो हमारा नाम लिखवाया गया सीधे पांचवीं में गांव की प्राइमरी पाठशाला में । हम और 'अंताबचन' मित्ते बन गए थे। अंताबचन उनका असली नाम नहीं था। मां बाप का दिया हुआ नाम था जीतेन्दर जो जित्ते जिल्ले होते होते जिलवा हो गया था। जिलवा ने अपना नामकरण अंताबचन इति स्वयं कर लिया था काहे कि माई,बाउजी, बाबा ईया, दू बहिन,घर में दुई भैंस, दुई गाई ,दू बाछा , दूई बैल और एक ठो कटही पिल्ली के होते हुए भी उ खुद को 'लावारिसे' बूझता था।
हमारे और अंताबचन के मित्ते बनने की भी कहानी है। डील डौल से हल्के मगर इरादों में बड़े खतरनाक थे हम बचपन में और अंताबचन लम्बे चौड़े मगर डरपोक। शिवरात्रि के मेले में दूसरे गांव के दो लड़कों ने जिलवा का मार ढेला कपार फोर दिया पलटवार में हमने उनके बजरमंड पर रेलवे पटरी के पत्थर के टुकड़ों से आक्रमण कर दिया था। बस ऐसी फीलिंग आई थी कि रामजी ने जैसे विभिषण को पीछे कर प्रहार खुद सह लिया हो।
खैर अगले दिन, अंताबचन कपार पर आधा पाव भांग हल्दी लगाए भिनसारे ही हमारे दुआर पर प्रकट हुए। कहने लगे सोनू भाई आज से हम तू मित्ते। हम जय और तू हमार वीरू और दोस्ती के निशानी के तौर पर चार ठो एकदम पियराइल गुरम्ही आ बुका हुआ अंडहवा बिरियानून हमें उपहार में मिल गया था।
मिताई में संयोग रस बस साल भर रहा और हम गांव छोड़ शहर में पढ़ने लगे। अंताबचन से मेला ठेला में मुलाकात होती रही। फिर अंताबचन बंबई चले गए गाना गाने और मजदूरों के साथ ठेकेदारी करने।
कोई दस साल अंताबचन बंबई में रहे। एकदिन किसी साइट पर गांव का ही मजदूर उपर 'पाइट' पर संतुलन खोकर नीचे गिरा और प्राण पखेरू उपर उड़ चले थे। अंताबचन के भावुक मन पर इसका गहरा असर पड़ा और अंताबचन 'दादर एक्सप्रेस' में बैठ ही गए। फिर कभी मुंबई न आने के लिए।
दादर से सलेमपुर जंक्शन और फिर वहाँ से "जौरा पर सवारी ढोने वाली गाड़ी" से सिसई गुलाबराय हाल्ट उतरकर गांव पहुंचे तो जिलवा को पहचान पाने वाले बहुत कम्मे मनई थे। पगलैट जिलवा अब 'धीरोदात्त नायक' था पर बस देखने में। अंदर से अर्द्धविछिप्त सा। अंताबचन कहने पर बुरा मान जाता। जितेन्द्र पाठक नाम के चार पांच विजिटिंग कार्ड पड़े थे और साथ था दक्षिण भारतीय फिल्मों के खजाने से भरा एक चमचमाता हुआ लैपटॉप।
यह सन २०१२ की गर्मियों के दिन थे। किसी ने जितेन्द्र पाठक को खबर कर दी कि सोनू गांव आए हैं। उस समय अंताबचन नाश्ता 'द ब्रेकफास्ट' कर रहे थे लेकिन नाम का प्रभाव कि सब छोड़े दौड़े आए। ऐसे मिले जैसे गंगा और जमुना। दुनिया 'द वर्ल्ड' की बातें होने लगीं। बातों बातों में अंताबचन भावुक 'द इमोशनल' हो गए। कहने लगे भाई कैसे भी करके बियाह 'द मैरिज' करा दो। हमारे लक्षण 'द करैक्टर' देखते हुए कोई भी बांभन 'द होलीमैन' अपनी बिटिया 'द डाटर' देने को तैयार नहीं और इधर उमर भागी जा रही जिंदगी धोखा 'द फ्राड' कर रही है।
पूरा मामला समझ लेने के बाद हमने अंताबचन से मजे लेने के अंदाज़ में पूछा कि अच्छा बताओ कैसी लड़की से शादी करोगे तो उत्तर में जिस लड़की का नाम जिलवा ने बताया सुन कर दिमाग के घोड़े 'द हार्सेस' उछल पड़े थे। अंताबचन को बगल गांव की पुष्पा पसंद थी जिसका नामकरण उनकी भाषा के हिसाब से पुष्पा 'द फ्लावर' हुआ था। दस कोस में वैसी लड़की न थी लेकिन बचपने में एक ठो बाउ साहिब से फंस के चली गई।
खैर,अंताबचन के दिमाग में कौनो ये बात भूसे की तरह भर दिया था कि हम बहुत योग्य और जादूगर ' द मैजिशियन' टाइप के आदमी हैं और उसका काम बना देंगे। जिलवा को समझाने के लिए बहुत कहानी सुनाए कि देखो एक्को पक्का मंतर जैसा कुछ नहीं होता। हमने सोचा कहानियों के लोभी जिलवा को कहानी सुनाकर टाल देंगे। कहानी सुनाई।
गायत्री बाबा प्रतिदिन सरयू स्नान के लिए जाया करते थे। मार्ग में एक गाँव पड़ता था। ब्राह्मण और क्षत्रिय कृषक लोग उसमें रहा करते थे। जिस रास्ते से गायत्री बाबा जाया करते थे, उसमें एक विधवा ब्राह्मणी की भी झोंपड़ी पड़ती थी। महामुनि जब भी उधर से निकलते विधवा या तो चरखा कातते मिलती या धान कूटते।
पूछने पर पता चला कि उसके पति के अतिरिक्त घर में आजीविका चलाने वाला और कोई नहीं था किसी बंगालन जादूगरनी के पीछे प्राण गंवा बैठे अब सारे परिवार का भरण-पोषण उसी को करना पड़ता है। एक ही पुत्र है अभी अबोध है, अतीव वृद्धावस्था के सास श्वसुर की सेवा सुश्रुषा की महती जिम्मेदारी भी है।

post achhi lage toh comment krke jarur bataye
ReplyDeleteअति उत्तम🙏🙏🙏🙏
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