सावन: एक सत्यकथा - भाग 2

 गायत्री बाबा को उसकी इस अवस्था पर बड़ी दया आई। उन्होंने उसके पास जाकर कहा-भद्रे मैं इस आश्रम का अध्यक्ष हूँ। मेरे कई शिष्य राज्य-परिवारों से संबंध रखते हैं, तुम चाहो तो तुम्हारे लिए आजीविका की स्थायी व्यवस्था कराई जा सकती है। तुम्हारी असहाय अवस्था मुझसे देखी नहीं जाती।परन्तु कष्टों ने ब्राह्मणी का शरीर छीना था उसका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास अब भी वह्निशिखा के समान देदीप्यमान थे। गंभीर स्वर में उसने बाबा को उत्तर दिया... महाराज आपकी असीम कृपा और करूणा से आज भी दो जून की रोटी में समस्या नहीं कोई।और जिस दिन न मिले एकादशी हो जाती है।

अब गायत्री बाबा पिघलने लगे....बोले पुत्र को बुलाओ..तीन चार वर्ष का गौरांग बालक महात्मा के समक्ष समुपस्थित हुआ। बाबा ने सर पे हाथ फेरा बोले-यहाँ से कुछ दूर पश्चिम दुग्धेश्वर शिव का निवास है वहाँ जा शिव से अपनी बात कह। कल्याण हो जाएगा।
बालक की माता ने कहा ..परंतु यह इतना छोटा है ना मंत्र जानता है ना प्रार्थना ना स्तुति और वहाँ छोटी काशी में विद्वानों का जमघट...इसकी बात शिव क्यों सुनेंगे?
" अरी! मृत्युंजय शिव अघोर उन सभी को मूक आमंत्रण देते हैं :-
-- जिन्होंने कभी किसी तत्व से प्रेम किया है
-- जो, प्रेम की तलाश में भटकते रहे हैं
-- जिनके, स्वरों की प्रतिध्वनियाँ चट्टानों से टकराकर लौट आई है
तुझे जो आता है वही बोल देना शिव प्रसन्न होंगे। बाबा चल पड़े..
छोटे ब्राह्मण पुत्र कुछ समय पश्चात दुग्धेश्वर शिव के दरबार में पहुंचे। स्तुति शुरू की----
"अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ॠ ऌ ॡ
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण (ड़, ढ़)
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
श ष स ह
क्ष त्र ज्ञ"
किसी ने मजाक उड़ाया किसी ने मखौल कोई हंसते गिरा.. किसी ने दया दिखाई और तभी चमत्कार हुआ। साक्षात मृत्युंजय महाकाल ने बच्चे को अपने अंक में भर लिया।
यह दिव्य दर्शन मुख्य पुजारी माधवेन्द्र सरस्वती जी को भी उपलब्ध हुआ।
रूद्ध कंठ से सरस्वती जी एक प्रश्न पूछने से स्वयं को न रोक पाए..."प्रभु वर्षों से रूद्राष्टकम् लिंगाष्टकम् शिवमहिम्नस्तोत्रम तांडवस्तोत्रम रूद्र सूक्तम् पुरूष सूक्तम् की आवृत्तियां करते रहे यह अहैतुकी कृपा नहीं हुई और हिंदी वर्णमाला पर प्रकट हो गए"?
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आकाशवाणी हुई...
"सरस्वती यह उसका सर्वस्व था जो उसने मुझे अर्पित कर दिया"
कथा सुन अंताबचन रोने लगे। भैवा 'द ब्रदर' हमार कल्याण तोहरिए हाथ से होगा। मरता क्या न करता।
हमने टालने की नियत से अंताबचन को कह दिया कि सावन के सावन हर सोम्मार भर लोटा पानी लेकर शिवलिंग पर चढ़ा देना। साथ में यह चौपाई सुनाते रहना..
"पाणिग्रहण जब कीन्ह महेसा
हिय हरसे तब सकल सुरेसा "
अंताबचन जल देते रहे सावन ही नहीं बल्कि हर रोज। किस्मत का कलछुला पलटा, कड़ाहा हिला।आलू उपर टमाटर नीचे। पुष्पा 'द फ्लावर' को बाउ साहब के यहाँ से एक ठो नेटुआ लेकर भाग गया कलकत्ता। अब जोलहा तो अपने आदत से मजबूर! फूलकुँअरि पुष्पा को आर्कैस्ट्रा में लगाकर पैसा कमाने लगा। पुष्पा छद्म-प्रेम के हाथों आत्मगौरव गंवाने के बाद स्थितप्रज्ञ हुई। जब इतने पैसे आ गए कि घर आ सके एक रात जोलहा को सल्फास देकर 'बाघ एक्सप्रेस' में बैठ गई।
घर की चिरैया भग्नहृदय, आहत मन,३०२ का भय लिए जब छत विछत पंखों के साथ घर पहुंची छबीला माली के मानों 'एन आर सी' से नाम गायब हो गया। ताण्डव रूप धर लिया। छबीला का नाम लोग भयवश आदर से लेते थे। ग्रामकालिका के लिए अड़हुल छबीला लाते, पंचरा गाने सबसे पहले उन्हें बुलाया जाता। उनकी आवाज सुन लगा कि छबीला पर देवी आई हैं पर नहीं यहाँ तो 'छबीला की देवी' आ गई थीं। गौरवर्ण, नृत्य और निरंतर श्रम से सधा गठा शरीर! चपल आंखों में संसार भर की निस्सारता लिए अपराधिनी की तरह खड़ी पुष्पा को देखकर किसी का भी हृदय बिक जाए।
बोलते बोलते छबीला माली रोने लगे कि अब क्या होगा तेरा? तुझे रहने खाने की यहाँ कोई तकलीफ नहीं रह पर जवान लड़की का निबाह कौन करे? हंगामा सुन हमारा नायक 'द हीरो' भी पहुंचा था। भरी सभा में पुष्पा का हाथ पकड़ लिया। हम करेंगे पुष्पा का निबाह! हम करेंगे इससे ब्याह 'द मैरिज'! यहीं शंकरजी के मंदिर में। पुलिस से बचाने की जिम्मेदारी हमारे और हमरे मित्ते सोनू की।
छबीला जितेन्द्र के पैरों में गिर गया। तोहरे बाबा गांव की इज्जत के लिए जमीन दिए थे जब नहर के लिए जमीन देने को कोई तैयार न था। अव्वल सोलह आना मालियत की बाईस बीघा जमीन के बीच से नहर निकलवाए और आज तुम अपनी जात दे दिए।
आज सावन सोमार अंताबचन के लड़का पैदा हुआ है। नाम रखने की जिम्मेदारी हमें मिली है। फोन पर पुष्पा 'द भउजी' का आदेश आया है।
हमारे मन में जो पहला नाम आया है!
वह है 'सा-वन'

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