विन्सेन्ट वान गा कहते थे?
विन्सेन्ट वान गा कहते थे कि मैं स्वप्न देखता हूँ कि मैं पेंट कर रहा और फिर मैं अपने स्वप्न को पेंट करता हूँ। केकुले को स्वप्न में बेंजीन रिंग दिखा, क्रिक को सपने में डीएनए का एंटीपैरलल स्ट्रक्चर। हमारे एक मित्र हैं संजय सिंह। हऊ ब्लैक टिकट वाले नहीं। ब्लैक कॉफी, ग्रीन टी और गोल्डन मिल्क वाले। सब सपना भूल जाते हैं एक बचपन का सपना आजतक न भूले। बल्कि अक्सर देखते रहते हैं। कि 'सपना' उनका नाड़ा वाला जंघिया धो रही है अंगना में और वह खुद उधर ओसारा में एगो बबुआ के साथे खेल रहे हैं। सपना कौन? उनके पापा के इकलौते चपरासी की एकलौती बेटी। खैर, यह अधूरा स्वप्न कभी पूरा न होना था। न हुआ।
अब एक दिन ऐसे ही बड़ी मनोहर लोकतांत्रिक हवा चल रही थी। लोकतंत्र के राजा अपनी प्रजा से मिलने उत्तर प्रदेश की राजधानी आए थे। जनजीवन मस्त था। जाम इतना कम था ट्रैफिक में कि प्रजा को झंडू बाम लगाकर निकलना पड़ रहा था। तिस पर जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव भी थे। पक्ष और विपक्ष में नैतिक पतन की जोर आजमाइश चल रही थी। पार्टी विद डिफरेंस सिद्धांतों से समझौता करके सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं कर रही थी। सवर्ण लोग एट्रोसिटी ऐक्ट के दुरूपयोग में लगे थे। गुपकार के उपर गुप्त परोपकार का आलम था। कश्मीर पर पंचायत थी और कश्मीरी ब्राह्मणों को ब्लैंक मैसेज भेजे जा रहे थे।कुल मिलाकर नखत जोग होरा मौसम सब देश का फंटास्टिक चल रहा था।
कोरोना के डेल्टा, थीटा, पाई, सिग्मा वैरिएंट अभी अंगडाई ले रहे थे। ब्रश करें, नहा धो के काम पर निकलें यह मनहूस वायरस इससे पहले हमने निश्चय किया कि आज संजय बाऊ साहब से उनके आशियाना में मुलाकात कर ली जाए। सुनते हैं उनका ही शासन चल रहा है। नहाए रगड़ के, धोए नहीं कुछ। फिर इत्र फुलेल क्रीम कंघी से नकली रूप बनाए। लहू का सौंदर्य आनन पर चमक ही रहा था। सब ओके था। फिर लगाए ट्रिपल टियर मास्क, उसके ऊपर एक एन 95 और फिर बांधे गमछा। फिर लगाए फेसशील्ड। बैग में रख लिए एक लीटर सैनिटाइजर, कि क्या पता कब वायरसों का दल गुरिल्ला वार पर ऊतारू हो!
हेलमेट, ड्राइविंग लाइसेंस, इंश्योरेंस, प्रदूषण, आरसी सब जेब में रख लिए। लेकिन फिर याद आया कि हमारे पास बाइक तो जो है, आने जाने लायक तो है लेकिन मुंह दिखाने लायक नहीं है। सोचे ठाकुर साहब के यहां जाना है तो कुछ भौकाल मारते हुए चलें। पड़ोसी श्रीवास्तव जी से उनकी नई बुलट मांगी। और मिल गयी।
हम उड़ चले।
सकल सूरत रंग रूप मास्क सैनिटाइजर और अपने वजन से पांच गुने वजन की गाड़ी के साथ क्या तो शोभायमान हो रहे थे हम। जैसे कहीं के गुनाहों के खलीफा या कि फिर कोई हवस का मौलाना। खैर, हम पहुंचे, बाऊ साहब का भोजन से पहले पूजापाठ चल रहा था। जोर जोर से प्रार्थना रामचरित से पढ़ रहे थे।
"बरू भल बास नरक कर त्राता। दुष्ट संग जनि देहु विधाता"
और तभी उनकी दृष्टि हम पर पड़ी। जाहिर है ईश्वर ने उनकी प्रार्थनाएं दृढ़ता से अस्वीकार कर दी थीं।
अगर फोटो ले पाया होता तो यह तस्वीर पृथ्वी के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीरों में से एक होती। संकटग्रस्त मानव की मनोदशा को दर्शाती यह तस्वीर संग्रहालयों के लिए एक नायाब नमूना होती।
पिछले कई बरस से संजय के ब्याह की चिंता में उनके पिता धृतराष्ट्र हुए जाते थे। ऐसा नहीं था कि संजय की जिंदगी में लड़कियाँ नहीं आयी थीं। आती थीं मगर सब घोषणापत्र के वादों की तरह जनता को लूट लाट के फुर्र। ऐसी कोई स्थायी नहीं मिली कश्मीर समस्या की तरह जो रच बस ले यहीं इनके दिल के हिंदुस्तान में। वास्तव में तो उस आदमी के पास हाथों और पैरों की अंगुलियों पर गिने जा सकने की संख्या में प्रेमिकाएं थीं जो अपने पतियों के बच्चे जनने और उन्हें पाल पोसकर बड़ा करने में खप गल रही थीं।
अब यहाँ यह जान लेना कि संजय भाई की शादी अब तक क्यों न हुई उतना ही जरूरी है जितना ताला लगाने के बाद उसे खींचना।
इनके घर में एक विशेष कप है। महाराज हर्षवर्धन के समय का। कुम्भ में हर्ष जब दान करने आया था तो इनके पूर्वज उसका काढ़ा पीने वाला कप लेकर भाग आए थे। जब हम पहुंचते चाय उसी कप में आती कि देख लो गरीब ब्राह्मण हम खानदानी रईस हैं।
खैर, संजय भाई के विवाह की देरी का कारण था उनका अपना रंग। हाय रे समाज। भारत के भविष्य की तरह उज्जवल रंग था उनका मतलब तवे को कर दिया जाए उल्टा। मन के सच्चे। जितनी बार लड़की देखने गये हमें साथ ले गये। हो गई गड़बड़। इस बार अकेले जाने की ठानी थी। हमें पनौती समझते हुए।

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