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Showing posts from July, 2021

सावन: एक सत्यकथा - भाग 2

  गायत्री बाबा को उसकी इस अवस्था पर बड़ी दया आई। उन्होंने उसके पास जाकर कहा-भद्रे मैं इस आश्रम का अध्यक्ष हूँ। मेरे कई शिष्य राज्य-परिवारों से संबंध रखते हैं, तुम चाहो तो तुम्हारे लिए आजीविका की स्थायी व्यवस्था कराई जा सकती है। तुम्हारी असहाय अवस्था मुझसे देखी नहीं जाती।परन्तु कष्टों ने ब्राह्मणी का शरीर छीना था उसका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास अब भी वह्निशिखा के समान देदीप्यमान थे। गंभीर स्वर में उसने बाबा को उत्तर दिया... महाराज आपकी असीम कृपा और करूणा से आज भी दो जून की रोटी में समस्या नहीं कोई।और जिस दिन न मिले एकादशी हो जाती है। अब गायत्री बाबा पिघलने लगे....बोले पुत्र को बुलाओ..तीन चार वर्ष का गौरांग बालक महात्मा के समक्ष समुपस्थित हुआ। बाबा ने सर पे हाथ फेरा बोले-यहाँ से कुछ दूर पश्चिम दुग्धेश्वर शिव का निवास है वहाँ जा शिव से अपनी बात कह। कल्याण हो जाएगा। बालक की माता ने कहा ..परंतु यह इतना छोटा है ना मंत्र जानता है ना प्रार्थना ना स्तुति और वहाँ छोटी काशी में विद्वानों का जमघट...इसकी बात शिव क्यों सुनेंगे? " अरी! मृत्युंजय शिव अघोर उन सभी को मूक आमंत्रण देते हैं :- -- जिन्हो...

सावन: एक सत्यकथा - भाग १

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  सावन: एक सत्यकथा न युग बीते न शताब्दियां बीतीं परंतु दुर्मुख काल का प्रभाव ! उस चमत्कार के साक्षी रहे निर्दोष ग्रामीण ही उस कथा को भूल बैठे। जिन बिरवों की जड़ें गांव में थीं पर ठूंसे और कल्ले महानगरों में और फुनगियां मेट्रो सिटीस् में उनसे तो क्या ही आशा। एल के जी का तब चलन नहीं था और हमारे जैसे मेधावी 'द जीनियस' एक दू तीन में काहे पढ़ते तो हमारा नाम लिखवाया गया सीधे पांचवीं में गांव की प्राइमरी पाठशाला में । हम और 'अंताबचन' मित्ते बन गए थे। अंताबचन उनका असली नाम नहीं था। मां बाप का दिया हुआ नाम था जीतेन्दर जो जित्ते जिल्ले होते होते जिलवा हो गया था। जिलवा ने अपना नामकरण अंताबचन इति स्वयं कर लिया था काहे कि माई,बाउजी, बाबा ईया, दू बहिन,घर में दुई भैंस, दुई गाई ,दू बाछा , दूई बैल और एक ठो कटही पिल्ली के होते हुए भी उ खुद को 'लावारिसे' बूझता था। हमारे और अंताबचन के मित्ते बनने की भी कहानी है। डील डौल से हल्के मगर इरादों में बड़े खतरनाक थे हम बचपन में और अंताबचन लम्बे चौड़े मगर डरपोक। शिवरात्रि के मेले में दूसरे गांव के दो लड़कों ने जिलवा का मार ढेला कपार फोर दिया पलट...

👉दो कौड़ी का ओपिनियन👈

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  लव जिहाद आदि की आड़ में असली षड्यंत्रकारी मिशनरी छुप जा रहे हैं। कन्वर्जन में वर्तमान इस्लामी इनसे बहुत बहुत पीछे हैं। लव जिहाद है, इससे पार पाना आसान है, आपके अपने हाथ में है। पर क्रिश्चियनिटी और चर्च पर समाधान तो दूर हमारे यहाँ चर्चा ही बहुत कम है। फिल्मी कलाकारों को इतना महत्व देना। मतलब किसके बच्चा हुआ, किसके तलाक हुआ, किसका ब्याह हुआ। किसकी ड्रैस फट गयी। उनका दो कौड़ी का ओपिनियन इतना महत्व का है आपके लिए? आप इन सबमें फंसे रहिए यही मीडिया चाहती है यही पॉलिसी मेकर्स भी चाहते हैं। वास्तव में आमजन को ही अंडा फार्म का अविकसित अनिषेचित अंडा बना दिया गया है। राजनेताओं और फिल्मी कलाकार, इनका जीवन ही अभिनय बन चुका है। इनकी हर अदा बनावटी है, फुटेज है बिजनेस और वोटबैंक के मद्देनजर डिजाइन किया गया है। तलाक को 'न्यू नॉर्मल' बना दिया जाएगा। आप देखते रहेंगे। नॉर्थ ईस्ट पूरा सेवन सिस्टर्स क्रिश्चियन बना दिया गया। हम आंख मूंदे रहे। केरल तमिलनाडु आन्ध्र दरक रहे लगातार। आप कश्मीर से आगे कुछ नहीं सोच पाए। सबका साथ सबका विकास और अन्य तमाम मुहावरों और अनुप्रासों के दम पर राष्ट्रवादी प्रचारव...

विन्सेन्ट वान गा कहते थे?

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  विन्सेन्ट वान गा कहते थे कि मैं स्वप्न देखता हूँ कि मैं पेंट कर रहा और फिर मैं अपने स्वप्न को पेंट करता हूँ। केकुले को स्वप्न में बेंजीन रिंग दिखा, क्रिक को सपने में डीएनए का एंटीपैरलल स्ट्रक्चर। हमारे एक मित्र हैं संजय सिंह। हऊ ब्लैक टिकट वाले नहीं। ब्लैक कॉफी, ग्रीन टी और गोल्डन मिल्क वाले। सब सपना भूल जाते हैं एक बचपन का सपना आजतक न भूले। बल्कि अक्सर देखते रहते हैं। कि 'सपना' उनका नाड़ा वाला जंघिया धो रही है अंगना में और वह खुद उधर ओसारा में एगो बबुआ के साथे खेल रहे हैं। सपना कौन? उनके पापा के इकलौते चपरासी की एकलौती बेटी। खैर, यह अधूरा स्वप्न कभी पूरा न होना था। न हुआ। अब एक दिन ऐसे ही बड़ी मनोहर लोकतांत्रिक हवा चल रही थी। लोकतंत्र के राजा अपनी प्रजा से मिलने उत्तर प्रदेश की राजधानी आए थे। जनजीवन मस्त था। जाम इतना कम था ट्रैफिक में कि प्रजा को झंडू बाम लगाकर निकलना पड़ रहा था। तिस पर जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव भी थे। पक्ष और विपक्ष में नैतिक पतन की जोर आजमाइश चल रही थी। पार्टी विद डिफरेंस सिद्धांतों से समझौता करके सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं कर रह...

औरतें सामान्यतः आदमियों से बुद्धिमान होती हैं?

औरतें सामान्यतः आदमियों से बुद्धिमान होती हैं फिर भी वे  दुःखी क्यों रहती हैं ?उनके कष्टों के पीछे की  7 विचित्र सच्चाईयाँ* ...  1  ये बचत में विश्वास करती हैं 2  फिर भी महंगे महंगे कपड़े खरीदती हैं 3  महंगे महंगे कपड़े खरीदती हैं, फिर भी कहती रहती हैं कि मेरे पास पहनने को कुछ भी नहीं है 4  पहनने को कुछ भी नहीं होता है फिर भी आलमारी में इंच भर भी जगह नहीं होती...और सजती बहुत सुन्दर हैं 5  सजती बहुत सुन्दर हैं,पर सन्तुष्ट कभी नहीं होतीं 6  सन्तुष्ट कभी नहीं होतीं, पर हमेशा चाहती हैं कि उनका पति उनकी तारीफ़ करे 7  चाहती हैं कि उनका पति उनकी तारीफ़ करे, पर पति सच में भी तारीफ़ करे तो विश्वास नहीं करतीं Short में  -   *औरत भिण्डी जैसी है .. और किसी के साथ  नहीं बनती हैं -----+--+++++++------------ 👉पुरुष हमेशा खुश क्यों रहते हैं ??? ये हैं उसके 7 कारण  1. फोन पर बात 30 सेकेंड 2. 5 दिन की यात्रा पर 1 पेन्ट ही काफी 3. आमंत्रण नहीं हो तब भी दोस्ती पक्की 4. पूरी जिंदगी 1 ही हेयर स्टाइल 5. किसी भी तरह की शॉपिंग के लिए 20 min ...

बिना छौंकी कुंवारी दाल मतलब जुल्म

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  बिना छौंकी कुंवारी दाल मतलब जुल्म -------------------------------------------------- इधर बहुत सारे रोगों में दालों की भूमिका सामने आ रही है। किडनी लिवर आदि के कई रोगियों को डॉक्टर दाल न खाने या बहुत कम इस्तेमाल की सलाह देने लगे हैं। हमारे यहाँ भोजन की जितनी प्रचुरता है उसी अनुरूप भोजन के साथ सैकड़ों हजारों बरस प्रयोग भी चले हैं। इन्हीं प्रयोगों की कड़ी में था दालों का संस्कार। यानी कि छौंकना बघारना। धीमे धीमे इस छौंक बघार का अलग अलग दालों के लिए एक निश्चित प्रोटोकॉल विकसित कर लिया गया था। इस बघार के कई स्वरूप थे। सबसे साधारण तरीका था पंचफोरन। यह अवश्य जान लीजिए कि दाल से पंचफोरन गायब मतलब स्वयं पर अत्याचार। यह पंचफोरन क्या था? राई, जी़रा, कलौंजी, मेथीदाना व सौंफ या कभी शाहजीरा भी, इन सभी को समान मात्रा मे मिलाकर रखा जाता था, समय समय पर अम्मा दादी इसे धूप दिखा दिया करती थीं। इनका मिलाजुला फ्लेवर और अरोमा दोनों अवर्णनीय अतुलनीय। एक तो दाल बनाने के लिए जिन फूल मिट्टी या कांसे के बने बटुला बटुली का इस्तेमाल होता था वहां यह सुविधा थी कि जब दाल झाग छोड़े तो उसे निकाल सकते थे। लम्बे समय ...