बिना छौंकी कुंवारी दाल मतलब जुल्म
बिना छौंकी कुंवारी दाल मतलब जुल्म
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इधर बहुत सारे रोगों में दालों की भूमिका सामने आ रही है। किडनी लिवर आदि के कई रोगियों को डॉक्टर दाल न खाने या बहुत कम इस्तेमाल की सलाह देने लगे हैं।
हमारे यहाँ भोजन की जितनी प्रचुरता है उसी अनुरूप भोजन के साथ सैकड़ों हजारों बरस प्रयोग भी चले हैं। इन्हीं प्रयोगों की कड़ी में था दालों का संस्कार। यानी कि छौंकना बघारना।
धीमे धीमे इस छौंक बघार का अलग अलग दालों के लिए एक निश्चित प्रोटोकॉल विकसित कर लिया गया था। इस बघार के कई स्वरूप थे। सबसे साधारण तरीका था पंचफोरन। यह अवश्य जान लीजिए कि दाल से पंचफोरन गायब मतलब स्वयं पर अत्याचार।
यह पंचफोरन क्या था? राई, जी़रा, कलौंजी, मेथीदाना व सौंफ या कभी शाहजीरा भी, इन सभी को समान मात्रा मे मिलाकर रखा जाता था, समय समय पर अम्मा दादी इसे धूप दिखा दिया करती थीं।
इनका मिलाजुला फ्लेवर और अरोमा दोनों अवर्णनीय अतुलनीय।
एक तो दाल बनाने के लिए जिन फूल मिट्टी या कांसे के बने बटुला बटुली का इस्तेमाल होता था वहां यह सुविधा थी कि जब दाल झाग छोड़े तो उसे निकाल सकते थे। लम्बे समय तक बिना दबाव के जब दाल पकती थी तो उसके विजातीय द्रव्य स्वयं ही बाहर आ जाते। आज एल्युमिनियम के प्रेशर कुकर के अतिरिक्त दबाव वाली व्यवस्था में यह संभव नहीं।
पंचफोरन दाल का संस्कार कैसे करती थी। लहसुन मिर्च हींग के साथ पंचफोरन एंटीकैंसर, एंटीआक्सीडेंट्स, एंटीबैक्टीरियल के साथ साथ मेटाबॉलिक मॉड्यूलेशन का भी काम करती थी।
अभी का तरीका ये कि या तो प्लेन दाल खाई जाए या दाल का मुर्गी बना दिया जाए। मसलन लहसुन अदरक पेस्ट के साथ भुनी प्याज और ढेर सारा टमाटर के साथ रिफाइंड ऑयल या सरसों का तेल। यह खतरनाक है।
दालों का यह संस्कार दालों के प्रयोग जितना पुराना तो नहीं फिर भी बहुत प्राचीन है। चना, मटर जैसी दालों के पहले साक्ष्य हरियाणा की घग्गर वैली में मिले थे।ये हड़प्पा संस्कृति से जुड़ा एक पुरातात्विक स्थल है।
कहते हैं कि ई.पू. ३०० चंद्रगुप्त मौर्य के विवाह में भी दाल को घुघनी के रूप में बनाया गया था और पंचफोरन इस्तेमाल हुए थे। महाभारत में भीमसेन द्वारा विशेष दाल की निर्मिति का प्रसंग है छौंक बघार के साथ।
मध्यकालीन भारत में दाल शाही व्यंजन थी। मुस्लिम शासक ढंग की दालें भारत आकर ही खा पाए थे।दम पुख्त नाम की दाल रेसिपी का आविष्कार यहीं हुआ जहां दाल को भाप की मदद से धीरे-धीरे पकाया जाता है।
ऐसे संदर्भ हैं कि अधिकांश मुगल शासकों को चना दाल विशेष प्रिय रही। इतनी कि इसे शाही दाल का दर्जा प्राप्त हो गया था। एक प्रकरण ऐसा भी कि राजा के सामने कोई अन्य दाल परोस दी गयी बिना छौंक के। गुस्से में न्यायप्रिय उदार तुर्क ने खानसामा को सज़ा-ए-मौत दी थी।
शाहजहां और नूरजहां की रसोई में शृंगारिक तत्व अधिक होना चाहिए न। पंचमेल दाल बनती थी। दाराशिकोह की दार्शनिक वृत्ति, उसे हल्के तड़के की मूंग दाल पसंद रही और कढ़ी। उग्र औरंगजेब के चने की दाल में लाल मिर्च बहुत।
गौर से देखेंगे तो भोजन के जितने कॉम्बिनेशन हैं वह या तो षड् रस की परिपुष्टि के लिए बने हैं। या प्रोटीन फैट कार्बोहाइड्रेट के साथ साथ विटामिन्स का भी बैलेंस बनाने के लिए। मसलन, दाल चावल चटनी, प्रयाग का डी.बी.सी.। दाल बाटी चूरमा आदि।
समृद्ध क्षेत्र या राजधानियों के निकट रहे क्षेत्रों में दाल मखनी जैसी रिच डिशेज भी दिखाई देंगी।
उद्देश्य यह कि दुबारा लाया जाए फूल कांसे का बना बटुला बटुली हांडा हांडी। घर पर तैयार कीजिए पंचफोरन। बन जाइए भीमसेन और भूल जाइए यूरिक एसिड की दिक्कतें।

post achhi lage toh comment krke jrur bataye
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